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इस बंदे की शाहदत को पढ़कर रोने लगेंगे आप, मुगलों को अकेले ही इस बंदे ने अपने पैरों में झुकने को कर दिया था मजबूर, लेकिन भूल गए इस बलिदान को हम आज

Banda Bahadur singh

Banda bahadur singh- अपना सब कुछ खो कर राष्ट्र के लिए कैसे काम किया जाता है, गुरु के वचनों को कैसे ग्रहण किया जाता है, दुश्मनों के सामने आंखें मिला कर अपने हक के लिए कैसे लड़ा जाता है, यह हमें बंदा सिंह बहादुर से सीखना चाहिए.

 बंदा सिंह बहादुर एक योद्धा थे लेकिन एक योद्धा से पहले वह एक सन्यासी थे. गुरु गोविंद के प्रिय शिष्य बंदा सिंह बहादुर योद्धा कब बने और योद्धा बनकर के मुगलों के नाकों में कैसे दम किया, आज हम आपको इस आर्टिकल में बताएंगे. बंदा सिंह बहादुर का सबसे पहला नाम माधो दास था. इनका जन्म 1670 ईसवी में कश्मीर के राजौरी  क्षेत्र में हुआ था. Banda bahadur singh

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एक  दिन की बात है जब वह 15 साल की उम्र में थे  तो उन्होंने अपने आंखों के सामने एक मृग को जीवन त्यागते देखा था. वह देखकर उनके मन में एक अजीब सी  हलचल होने लगी.वह इतने बेचैन हो गए कि  जानकीदास नाम के एक सन्यासी को अपना गुरु बना लिया.

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जब गुरु गोविन्द सिंह जी की चमकौर के युद्ध में मुगलो से पराजय हुई और उनके दो, सात और नौ वर्ष के शिशुओं की नृशंस हत्या कर दी गयी तो उसके बाद गोविन्द सिंह जी लक्ष्मण दास यानी कि बन्दा बहादुर से मिले थे. तब गुरूजी ने बन्दा बहादुर सिंह को बोला था कि बंदे अगर राजपूत ही सन्यासी बन जायेगा तो इस देश व् धर्म की रक्षा कौन करेगा. गुरु जी से मिलने के बाद बंदा बहादुर को समझ आ गया था कि वह एक योद्धा है.

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अंत में गुरु जी के ज्ञान और उनके पुत्रों  बलिदान किया हुआ जीवन इनको इतना प्रभावित कर दिया कि वह शस्त्र उठाने के लिए तैयार हो गए. तभी 1709 ईस्वी में अपनी माँ अपने देश की रक्षा करने के लिए पंजाब पहुंच गये और वहां जाते ही सिखों के साथ मिलकर जनता को परेशान कर रहे हजारों मुगलों को मौत के घाट उतार दिया. कहते हैं कि बन्दा बहादुर अकेले इस युद्ध में ऐसे लड़ रहा था कि जैसे यह इसका आखरी युद्ध हो. अकेले ही बन्दा बहादुर 5 मुगल सैनिकों से एक ही बार में अकेले लड़ रहा था. यह सब हो जाने के बावजूद  बंदा सिंह बहादुर कहां रुकने वाले थे.  इन्होनें सरहिंद के फौजदार वजीर खान को मौत हवाले किया.

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उसके बाद उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में कब्जा किया. अमृतसर और जालंधर में बेसहारा लोगों के अधिकार के लिए लड़ाई भी लड़ी. यहां तक कि किसानों की जमीन उनको वापस लौटा दिए.  लाहौर के पूर्व हिस्से में और पूरे पंजाब  सिखों के शासन में मुगलों की राजधानी दिल्ली और लाहौर के  बीच का बातचीत का माध्यम पूरी तरीके से खत्म करा दिया. यह सुनकर  मुगल बादशाह बहादुर परेशान हो गए. इसके पीछे कारण को ढूंढने लगे तब उनको पता चला कि बंदा सिंह बहादुर है इसके पीछे.

इस बात को जानते ही उन्होंने हर कोशिश की उन्हें बंधक बनाने के लिए अंतिम क्षण तक कोशिश की और आखिरकार इस पर उन्होंने जीत हासिल की. बादशाह फर्रुखसियर ने बन्दा बहादुर को आखरी समय में भी सिख धर्म को छोड़ इस्लाम लेने को बोला लेकिन बन्दा बहादुर ने शहीद होना स्वीकार किया किन्तु गुरु गोविन्द का दिया धर्मं नहीं छोड़ा.

शहीद होने से पहले बन्दा बहादुर ने सहारनपुर और मुजफ्फरनगर तक के लोगों को न्याय दिलाया. सहारनपुर के गुर्जर और जाट भी बन्दा बहादुर का नाम लेकर ही धर्म की रक्षा की लड़ाई लड़ रहे थे.

लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं माना  जिसके बाद यह हुआ कि बंदा सिंह बहादुर की आंखें फोड़ दी गई और उनकी शरीर की सारी त्वचा को खींच ले गई और यह सब बंदा सिंह बहादुर ने आखिरी दम तक सहा लेकिन मुगलों के सामने सिर नहीं झुकाया.

वाकई बंदा सिंह बहादुर की हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी  जिन्होंने अपने लोगों के लिए एकजुट होकर के मुगलों से लड़ाई की और आखिरी दम तक अपनी लड़ाई को लड़ी.

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