पक्के सबूत देख रोने लगेंगे आप, हल्दीघाटी का युद्ध अकबर ने ही बल्कि महान हिन्दू योद्धा महाराणा प्रताप ने जीता था

Haldighati Yudh Real Story

Haldighati Yudh Real Story- भारत का इतिहास सदा से ही युद्धों से भरा हुआ रहा है. जो लोग और जो अंग्रजी किताबें भारतीय योद्धाओं को कायर कहती हैं तो वह निश्चित रूप से झूठी हैं. आपको बता दें कि भारत सदा से अपनी रक्षा के लिए लड़ता हुआ आया है. भारत के इतिहास में कई सारे युद्ध हुए हैं, इनमें से कुछ कौशल सीखने लायक हैं तो कुछ विनाशकारी घटनाओं को सामने रखते हैं. आज हम आपको ऐसे ही एक विनाशकारी युद्ध के बारे में बताएंगे, जिससे आप की इतिहास जानकारी और भी मजबूत हो जाएगी.

हल्दीघाटी युद्ध के बारे में तो सुना ही होगा, अगर नहीं तो आइए हल्दीघाटी के युद्ध के बारे में कुछ जानकारियां प्राप्त करते हैं. किताबों में हल्दीघाटी युद्ध का वर्णन थोड़ा कम किया गया है. तो आइये आपको आज हम हल्दीघाटी युद्ध की कुछ बेसिक जानकारी देते हैं- Haldighati Yudh Real Story

Haldighati Yudh Real Story

युद्ध कब हुआ

यह युद्ध 18 जून 1576 ई. में  बादशाह अकबर और महाराणा प्रताप के बीच हुआ था. यह माना जाता है कि हल्दीघाटी युद्ध महाभारत के जैसा ही  विनाशकारी  युद्ध था. जहां ना बादशाह  की जीत हुई ना महाराणा प्रताप की हार. जहां मुगल बादशाह के पास सैन्य शक्ति अधिक थी तो वहीँ  महाराणा प्रताप के पास जुझारू शक्ति अधिक थी. कोई नहीं जानता था कि इस युद्ध में हार जीत किसकी होगी.

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मुगल आक्रमण

उदय सिंह 1541 ई.  एक मेवाड़ के के राजा थे. मुगलों ने मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़ को हासिल करने के लिए चित्तोड़ को घेर लिया. लेकिन महाराणा उदयसिंह ने अकबर की अधीनता को स्वीकार करने से इंकार कर दिया. यह देख मुगलों ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया जिससे चित्तौड़ में कई लोग मारे गए. अंत में जब उदय सिंह को यह एहसास हुआ कि इतने मेवाड़ी मरने के बाद अब चित्तौड़ नहीं बचेगा तो ऐसे में जयमल और पत्ता वीरों के हाथ छोड़ दिया और वह अरावली के घने जंगल में चले गए. जंगल में कई दिन व्यतीत करने के बाद इन्होंने बांध और नदियों को रोककर उदयसागर का निर्माण किया. राजपूत और मुग़ल सैनिकों के मध्य ‘हल्दीघाटी का युद्ध’ जून, 1576 ई. में लड़ा गया. बादशाह अकबर ने मेवाड़ को पूर्णरूप से जीतने के लिए राजा मानसिंह एवं आसफ़ ख़ाँ के नेतृत्व में मुग़ल सेना को आक्रमण के लिए भेजा. दोनों सेनाओं के मध्य ‘गोगुंडा’ के निकट अरावली पहाड़ी की हल्दीघाटी शाखा के मध्य युद्ध हुआ.

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चित्तौड़ के विनाश के चार साल बाद उदय सिंह का देहांत हो गया इसके बाद महाराणा प्रताप ने युद्ध जारी रखा और अकबर के अधीनता को अपनाने से भी साफ इनकार कर दिया.

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कुछ दिनों बाद युद्ध को जारी करने के लिए महाराणा प्रताप हल्दीघाटी के मैदान में पहुंचे. वहां पहुंचकर मुगलों की सेनाओं का वध किया. जयते का बादशाह भी पीछे नहीं हटे उन्होंने भी उसी युद्ध में डटकर के हिस्सा लिया. यह युद्ध ऐसा था मानो न महाराणा प्रताप की जीत हो पा रही थी ना ही बादशाह की.

दोनों अपनी पूरी शक्ति का इस्तेमाल करके  इस युद्ध में  लड़ाई कर रहे थे. हालांकि इस युद्ध का अंत कैसा हुआ जिसने इस युद्ध में विजय हासिल किया इस पर अभी भी एक रहस्य बना हुआ है.

कुछ का मानना है कि बादशाह अकबर की जीत हुई तो कुछ का मानना है कि महाराणा प्रताप की जीत हुई. लेकिन आखिरकार जीत किसकी हुई इसका पता अभी तक नहीं चल पाया है  और इस चीज की जानकारी पाने के लिए शोध जारी है.

इतिहासकार डॉ. चन्द्र शेखर शर्मा ने अपनी रिसर्च में कहा है कि इस युद्ध में महाराणा प्रताप ने जीत हासिल की थी. डॉ. शर्मा ने विजय को दर्शाने वाले प्रमाण रजत विद्यालय विश्वविद्यालय में जमा कराए हैं. कई सिक्के जमा कराये गये हैं जो महाराणा प्रताप ने जीत के बाद राज्य के लिए बनवाये थे. वहीँ कई तामपत्र भी दिखाए गये हैं जो महाराणा प्रताप की जीत साबित करते हैं.

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