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इतिहास

इस नीम के पेड़ पर 1857 की क्रांति के 864 क्रांतिकारियों को बेहरमी से लटकाकर मार दिया था अंग्रेजों ने, आज कोई नहीं पूछता इस पेड़ को

नीम के पेड़ पर क्रांतिकारियों को फांसी

नीम के पेड़ पर क्रांतिकारियों को फांसी– नीम का पेड़- वैसे तो सभी पेड़-पौधे हमारे जीवन का बहुत अहम हिस्सा है. इनके बिना धरती पर जीवन की कल्पना नहीं किया जा सकता लेकिन इन्हीं पेड़ों में एक पेड़ ऐसा भी है जो गवाह है उस इतिहास का जिस कारण हमें आजादी मिली. ये गवाह है उन 864 लोगों के प्राण का जिन्होंने देश के लिए हंसते हंसते इस पेड़ पर फांसी लगवाना कबूल किया.

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ये पेड़ आजादी के बाद उन अतिक्रमणों का भी गवाह है जो रोज इसके नीचे लग जाता है. ये पेड़ गवाह है उस बेरुखी का भी जिसके कारण सात पेड़ों में से अब सिर्फ एक बचा हुआ है. नीम के पेड़ पर क्रांतिकारियों को फांसी-

 नीम के पेड़ पर क्रांतिकारियों को फांसी

इलाहाबाद के चौक एरिये में मौजूद नीम का पेड़ कोई आम पेड़ नहीं है बल्कि यह वह एतिहासिक पेड़ हैं जहां 1857 की क्रांति में अंग्रेजों के छक्के छुराने वाले 864 शहीदों को बेरहमी से लटकाकर मार दिया गया.

1857 की क्रांति मेरठ से शुरु होकर देश के विभिन्न हिस्सों में फैल गई थी. इलाहाबाद में भी 12 मई को किले में मौजूद 6 भारतीय टुकड़ियों ने विद्रोह कर दिया. इन विद्रोही सैनिकों ने अंग्रेजी सैनिको को हरा कर किले पर फतह हासिल कर ली थी. 6 जून को अंग्रेजी सैनिको और हिन्दुस्तानियों में जंग हुआ जिसमें कई अंग्रेजी सिपाही मारे गए. इलाहाबाद के ज्यादातर हिस्सों पर भारतीयों का कब्जा हो गया.

 नीम के पेड़ पर क्रांतिकारियों को फांसी

इसके बाद एक बार फिर कर्नल नील के नेतृत्व में 40 अग्रेंजी सैनिकों ने हमला कर दिया. हिन्दुस्तानी पुरे जोश में थे. उन्होंने इसका डट कर मुकाबला किया. विद्रोहियों का नेतृत्व एक फकीर मौलवी लियाकत अली के हाथों में था. लियाकत अली ने अग्रेंजी सैनिकों को मार भगाया. इसके बाद खुद को इलाहाबाद का गवर्नर घोषित कर दिया.

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इसके बाद ही अंग्रेजों को समझ में आ गया था कि अब भारत में ज्यादा समय तक राज नहीं किया जा सकता. लेकिन वो भी हारने वाले नहीं थे. उन्होंने बर्बरता के साथ इलाहाबाद में मार काट मचाया और सिर्फ 3 घंटे 40 मिनट में 634 लोगों को नीम के पेड़ पर लटका दिया.

 नीम के पेड़ पर क्रांतिकारियों को फांसी

जब उनको पेड़ पर लटकाया गया तब चौक पर 7 नीम के पेड़े थे लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि इस ऐतिहासिक पेड़ को देखने वाला कोई नहीं. इनमें से 6 पेड़ समाप्त हो गए जबकि एक बचा हुआ है जिसकी हालत देखकर कहा जा सकता है कि यह भी जल्दी ही समाप्त हो जाएगा और यह एतिहासिक जगह अपनी पहचान खो देगा.

राजनीतिक उठा-पटक के बीच इसे कई बार बनाने का मुद्दा उठा लेकिन हर बार सिर्फ मुद्दा ही बनकर रह जाता है. इस बार वहां पेड़ के नीचे लगने वाले अतिक्रमण को हटाने की पहल हुई है. इससे पहले इस चौक पर चार दरवाजे बनाने की बात कही गई थी लेकिन वो कब तक बनेगा यह कहा नहीं जा सकता.

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