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इतिहास

इस क्रांतिकारी ने अकेले हिला दी थी ब्रिटिश सरकार, 15 हजार लोगों की थी इसकी सेना

तीतू मीर क्रांतिकारी

आज हम जिस आजाद भारत में खुली सांस ले रहे हैं हमें यह बस यूं ही नहीं मिल गयी है. हमारे पुर्वजों ने इसके लिए अपनी जानें दी हैं. 200 सालों की अंग्रेजों की बेड़ियों को तोड़ने में हमारे कई वीरो ने अपनी जान न्योछावर कर दी. घर को त्याग दिया, अपनी खुशियों को छोड़ दिया ताकि मेरा देश आजाद हो जाए. आजादी के बाद भी कई वीर ऐसे हैं जिनको हम आजाद भारत के लोग नहीं जानते हैं.

भगत सिंह, सुखदेव जैसे न जाने कितने ही वीरों ने अपने जान की परवाह किए बगैर अंग्रेजो से लोहा लिया. हमारे हर वीर सैकड़ों अंग्रेजो पर भारी पड़े.

इन जवानों में ज्यादातर वो जवान थे जो अपनी जवानी के दहलीज पर देश के लिए लड़ाई लड़े. ऐसे ही एक योद्धा है तीतू मीर जिसने एक अच्छा योद्धा होने की मिशाल दी. तीतू मीर क्रांतिकारी- 

तीतू मीर क्रांतिकारी

अग्रेजों के विरुद्ध मुसलमानों ने वहाबी आंदोलन किया. इस आंदोलन के संस्थापक सय्यद अहमद बरेलवी थे. सय्यद अहमद के ही शिष्य थे तीतू मीर. इन्ही को मीर निथार अली के नाम से भी जाना जाता है.

मीर ने वहाबी आंदोलन का पर्वतन किया. बंगाल में नील के अंग्रेजी व्यापारी तथा हिंदू जमीदारों के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया. इन्होंने लोगों को इकट्ठा किया. मीर ने जिस तरह से सरकार के विरुद्ध काम किया कि सरकार भी इसके विरुद्ध नहीं जा पाई. सरकार के पास ऐसे पर्याप्त कारण नहीं थे कि इसको आतंकवादी संगठन कह सके.

तीतू मीर एक ऐसा योद्धा था जिसने बंगाल के 24 परगना को एक साथ लाने का काम किया. इन सभी परगनाओं ने एक साथ अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध किया.

तीतू मीर क्रांतिकारी

तीतू मीर क्रांतिकारी

1831 में तीतू के साथ 15 हजार लोग आ गए थे. इन लोगों ने खुद को स्वतंत्र होने की घोषणा करते हुए एक बांस का किला तक बना लिया था.आन्दोलन के आखरी समय में सरकार और अंग्रेज अधिकारियों में कई झड़प हुई.

 

अंग्रेजों और जमीदारों के जुल्मों के खिलाफ लड़ने वाले तीतू मीर 24 जनवरी 1831 की मुठभेड़ बर्दाश्त नहीं कर सके. अंग्रेजों ने उन्हें घेर लिया और उनको और उनको साथियों को मार गिराया. उनके अन्य साथियों को या  तो फांसी पर चढ़ा दिया या काला पानी भेज दिया गया. इस तरह तीतू मीर की शहादत के साथ ही यह आंदोलन समाप्त हो गया. लेकिन कहते हैं कि जब तक यह योद्धा तीतू मीर रहा तक तक अंग्रेज समझ नहीं पा रहे थे कि किसे यह युद्ध खत्म किया जाए. थोड़े संसाधनों से भी युद्ध लड़ा जाता है यह बात तीतू मीर ने उस समय लोगों को समझा  दी थी. 

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