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इस गुर्जर राजा ने अंग्रेजों को लगवा दिया था बैलों की जगह गाड़ी में, मच गया था हाहाकार

story of umrao singh gurjar freedom fighter

आजादी के लिए हमारे वीरों को बहुत बलिदान देने पड़े. आप अगर सोचो की आजादी फ्री में मिल गयी है तो यह आपकी बड़ी भूल होगी. आजादी की लड़ाई किसी धर्म, जाति की नहीं बल्कि हर एक भारतीय की थी. इसमें भाग लेने वाला हर एक भारतीय था जो बस चाहता था कि अंग्रेजों से उन्हें मुक्ति मिले. 1857 की क्रांति को भूला नहीं जा सकता. यह पहली चिंगारी थी जोे बड़े स्तर पर एक साथ नजर आई थी.

 

इस क्रांति को शुरु तो मंगल पांडे ने किया था लेकिन अलग-अलग जगह इस क्रांति को लेकर चलने वाले अलग थे. दादरी के पास इसी समय कुछ ऐसा हुआ था कि अंग्रेजों में हाहाकार मच गया था. अंग्रेजों को पकड़कर बैलगाड़ी में लगवा दिया गया था. तो आइये पढ़ते हैं राजा उमराव सिंह गुर्जर की पूरी कहानी- story of umrao singh gurjar freedom fighter

story of umrao singh gurjar freedom fighter

दादरी के राजा उमराव सिंह गुर्जर भी 1857 की क्रांति में किसी नायक से कम नहीं थे. इन्होंने न केवल अंग्रेजों का मुकाबला किया उनसे खेतों में हल भी चलवाया. खेतों में इस बहादुर गुर्जन से बैलों के जगह अंग्रेजों को रखकर हल चलवाया था.कुछ इतिहास की किताबों में इस वीर राजा को कोई ज्यादा विस्तार से इतिहास तो मौजूद नहीं है लेकिन ऐसा बताया जाता है कि जब 1857 की क्रान्ति शुरू हुई तो अंग्रेज टुकड़ी मेरठ में क्रांतिकारियों को मारने दादरी के रास्ते से जा रही थी. तब राजा उमराव सिंह गुर्जर ने बड़ी बहादुरी से अंग्रेजों की पूरी सेना को वापस दिल्ली लौटने पर मजबूर कर दिया था और अंग्रेजों को पकड़कर अपने खेतों में बैलों की जगह लगाकर उनसे काम करवाए थे. इस बात से अंग्रेजों की पूरी सेना में हाहाकार मच गया था कि अब वह भारत पर राज कैसे कर पाएंगे. राजा उमराव को किसी भी हालत में पकड़ने का फरमान जारी कर दिया गया था. 

राजा उमराव सिंह गुर्जर का जन्म कटेहडा गांव में हुआ जो दादरी के नजदीक था. जब क्रांति की मिशाल मेरठ में जली तो उससे प्रेरित होकर उमराव गुर्जर ने अपने लोगों को प्रेरित किया और 12 मई 1857 को सिकंदराबाद के तहसील पर हमला कर अपने कब्जे में कर दिया. यह सब तब हुआ जब बैलों की जगह अंग्रेजों की घटना हो चुकी थी और अंग्रेज एक बार उमराव से हार चुके थे.

गुर्जर से हारने के बाद युद्ध के नए फरमान जारी हुए. उमराव गुर्जर से परेशान अग्रेंजी मजिस्टेट गुर्जर का मुकाबला करने पहुंच गए. गुर्जर ने मजिस्टेट का डट कर मुकाबला किया. सात दिनों तक चले इस मुकाबले में गुर्जर को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया. अंग्रेजी सेना ने 46 लोगों को गिरफ्तार कर लिया पर गुर्जर वहां से भाग निकले.

दो दिन बाद गुर्जर अपने लोगों को छुड़ाने के लिए बुलंदशहर पहुंच गए. उन्होंने जेल पर हमला कर दिया और अपने साथियों को बाहर निकाल लिया. 30-31 मई को एक बार फिर गुर्जर और अंग्रेंजो का मुकाबला हुआ. हिंडन नदी पर हुआ यह मुकाबला एतिहास में दर्ज है.

story of umrao singh gurjar freedom fighter

कासना सूरजपुर में 26 सितम्बर को एक बार फिर अंग्रेजों से मुकाबला करते हुए गुर्जर अंग्रेजों के हाथ चढ़ गए. इसके बाद उन्हें बुलंदशहर में स्थित कालेआम पर उन्हें फांसी दे दिया गया और इस तरह एक सच्चा देशभक्त गुर्जर भारत माता के लिए शहीद हो गया. गुर्जर को फांसी देने के बाद उनके भाइयों 87 देशभक्तों को भी मौत के घाट उतार दिया गया. लेकिन तब तक उमराव गुर्जर इतिहास में दर्ज हो गया था. अंग्रेजों को बैल की जगह लगाने वाली घटना के बाद से ही उमराव अंग्रेजों के निशाने पर था.

 

आज आजाद भारत के इतिहास में ऐसी कहानियों को ना जाने कहाँ दफ़न कर दिया गया है. युवाओं को अपने वीरों से मतलब नहीं है और बूढों को विरासत बचाने में कोई रूचि नहीं है. इसलिए ऐसे वीर योद्धाओं की कहानियां बस गुमनामी की दुनिया में कहीं खो गयी हैं. 

3 Comments

3 Comments

  1. sandeep kumar bhati

    August 11, 2018 at 3:07 am

    isme kahi bhi baba majlis luharli ka jikr nahi h.
    jabki sikandarabad aur bulandsahar ke humle main
    unki jeli sena ka bahut bada yogdan tha.

  2. sandeep kumar bhati

    August 11, 2018 at 3:11 am

    और सबसे पहले दादा मजलिस लुहारली ने अंग्रेजो से हल चलवाये थे 1857 की क्रांति से भी पहले

  3. sandeep kumar bhati

    August 11, 2018 at 3:12 am

    2, 3 अंग्रेज कोट की नहर में डुबोकर मार दिए थे जब अंग्रेज कोठी जो कोट की नहर पर है उसमे रहते थे

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