कहानी उन दो भगवा बाबाओं की जो 1857 की क्रांति के जनक रहे, मंगल पांडे के चाणक्य रहे
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इतिहास

कहानी उन दो भगवा बाबाओं की जो 1857 की क्रांति के जनक रहे, मंगल पांडे के चाणक्य रहे और अंग्रेज इन बाबाओं को गिरफ्तार करने हिमालय तक चले गए थे

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1857 की क्रांति| 1857 revolt in hindi

(1857 की क्रांति) (1857 revolt in hindi) आजादी की लड़ाई की ऐसी असंख्य कहानियां आज भी किताबों में दफन हैं जो भारत के स्वाभिमान और आजादी के संघर्ष की गाथा बताती हैं. आज की युवा पीढ़ी इन कहानियों से काफी दूर निकल गई है और उसको शायद स्वतंत्र भारत में संघर्ष की इन कहानियों से कोई मतलब नहीं रह गया है या फिर यूं बोलें कि इन कहानियों को इस तरीके से छुपा दिया गया है कि आज के युवा इन कहानियां के ऊपर आ ही नहीं पाते हैं. 1857 में जब मंगल पांडे मेरठ में अंग्रेजो के खिलाफ क्रांति की तैयारियां कर रहे थे तो उसी समय दो बाबाओं की कहानी भी काफी प्रचलित है जो हिमालय की गुफाओं में मिले थे और इस गुलाम भारत की आजादी का सपना देख रहे थे.

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दयानंद सरस्वती और बंसुरिया बाबा

इन दो बाबों में एक का नाम साधु स्वामी दयानंद था जिनको कि हम दयानंद सरस्वती के नाम से जानते हैं तो वहीं दूसरे बाबा बंसुरिया बाबा हैं जिनको आजाद भारत में उतना नहीं जाना गया जितनी कि इनको जानने की आवश्यकता है. इतिहास की किताबों में ऐसा लिखा हुआ है की बंसुरिया बाबा और दयानंद सरस्वती 1857 की क्रांति के जनक रहे हैं. दरअसल 1857 की क्रांति मंगल पांडे से जोड़कर देखी जाती है लेकिन इस क्रांति की आग को अगर किन्ही दो लोगों ने लगाया या फिर लोगों को इस क्रांति के लिए जागृत किया तो उन लोगों का नाम बंसुरिया बाबा और दयानंद सरस्वती ही बताया गया है.

कहने को तो यह दोनों ही भगवा साधु संत, भगवान की प्राप्ति के लिए हिमालय की ओर निकल गए थे. हिमालय में दोनों बाबा गुफाओं में मिले थे और जब यह दोनों मिले तो दोनों का सपना एक ही था कि किसी भी तरीके से भारत माता को आजाद कराना है. इन दोनों का ही ध्यान गुलाम भारत में रहने पर नहीं था और ना ही यह गुलाम भारत में भगवान की प्राप्ति करना चाहते थे. यही कारण है कि इन दोनों ने कसम खा ली थी कि अब हिमालय से नीचे उतरकर लोगों के बीच जाएंगे और उनको गुलामी से लड़ने के लिए तैयार करेंगे.

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दयानंद सरस्वती और मंगल पांडे

दयानंद सरस्वती जब झांसी में थे तो उस समय गुलाम भारत के लोगों ने सरस्वती जी से पूछा था कि आपको झांसी कैसा लगा? तब दयानंद सरस्वती जी के वचन थे कि गुलाम भारत में कोई भी राज्य, प्रदेश इस समय अच्छा नहीं है. गुलाम भारत में अगर सभी सुख सुविधाएं भी हमें दे दी जाए तब भी यह राज्य प्रदेश हमारे अपने नहीं होने वाले हैं. इसलिए अगर आपको कुछ करना है तो इस गुलाम भारत को आजाद कराना है. दयानंद सरस्वती हमेशा लोगों से बताते थे कि जैसे शंकराचार्य ने धर्म की रक्षा के लिए चारो धर्म बनाए थे उसी तरीके से हमको देश की रक्षा के लिए जगह-जगह आजादी के मठ स्थापित करने होंगे और यही मठ स्थापित करने के लिए लगातार दयानंद सरस्वती और बंसुरिया बाबा गुलाम भारत में जगह-जगह घूम रहे थे.

‘स्वतंत्रता आंदोलन में मेरठ’ इस नाम से एक पुस्तक छपी, इस पुस्तक में दयानंद सरस्वती का 1857 क्रांति में योगदान खुलकर बताया गया है. दयानंद सरस्वती के आजादी पर संघर्ष की असली गाथा इसी पुस्तक में है आपको यह पुस्तक जरूर पढ़नी चाहिए.

इसी पुस्तक में आपको बंसुरिया बाबा और दयानंद सरस्वती के किस्से भी मिल जाएंगे. मंगल पांडे लगातार इन दोनों ही बाबू बाबाओं से मिलकर अपनी तैयारी और क्रांति की अलख जगाने के लिए मिलते रहते थे. मंगल पांडे बारी-बारी से बंसुरिया बाबा और दयानंद सरस्वती से मिले थे. दयानंद सरस्वती ने ही सबसे पहले यह बात देशभर में बतानी चालू की थी कि कारतूस में चर्बी है. दयानंद सरस्वती ने एक योजना के तहत ही प्याऊ खोला था और वहां पर जो भी विश्वसनीय व्यक्ति पानी पीने आता था उनको यह कारतूस और चर्बी की बात बाबा जरूर बताते थे.  दूसरी तरफ बंसुरिया बाबा घूम घूम कर लोगों को यही बात बता रहे थे. मंगल पांडे बसुरिया बाबा और दयानंद सरस्वती से कई बार मिले थे. दयानंद सरस्वती मंगल पांडे को आजादी की लड़ाई के लिए समझाया था और मनाया था. दयानंद सरस्वती ने ही आगे चलकर आर्य समाज की स्थापना की थी. मंगल पांडे बसुरिया बाबा और मंगल और दयानंद सरस्वती को अपने गुरु बताते थे.

इतिहास के दो बड़े लेखक डॉ एस एल नागोरी और प्रणव देव अपनी पुस्तकों में बंसुरिया बाबा और दयानंद सरस्वती के संघर्ष के बारे में काफी कुछ लिखते हैं. दयानंद सरस्वती से ही मंगल पांडे ने पूछा था कि आप अंग्रेजों को कारतूस और चर्बी इस्तेमाल ना करने के लिए क्यों नहीं मनाते हैं? तब दयानंद सरस्वती ने मंगल पांडे को कहा था कि अंग्रेज मांगने से कुछ भी नहीं देने वाले हैं अंग्रेजों से कोई चीज लेनी है तो वह छीननी ही होगी.

आजादी की लड़ाई में दयानंद सरस्वती और बंसुरिया बाबा ने काफी संघर्ष किया और लोगों में अलख जगाने का काम इन दोनों ने किया था. यह दोनों ही बाबा कभी हिमालय की गुफाओं में मिले थे और इसके बाद गुलाम आजाद को स्वतंत्र कराने के लिए दोनों ने ही काफी संघर्ष किया है लेकिन इतिहास की पुस्तकों में इन दोनों ही बाबाओं के संघर्ष को न जाने क्यों छुपाकर रख दिया गया है. अगर आप चाहते हैं कि दयानंद सरस्वती और बंसुरिया बाबा की कहानी आगे बढ़े तो आप इस लेख को आगे से आगे और ज्यादा शेयर जरूर करें.

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